वो कई बार कहती थी,
झुंझला के कहती थी
चिल्ला के कहती थी

नहीं जाना है मुझे वहाँ
घर वो भी अपना है तो क्या
वहाँ जा के मुझे,

अपना- सा नहीं लगता है
पिता-सा नहीं लगता है.
पिता जैसे हुए तो क्या
स्पर्श उनका मुझे

पर उसकी हर बात को सबने
उसका बचपना कह, अनदेखा किया
उसके उस अनचाहे एहसास को सबने
गलतफहमी कह,!

वहम का नाम दिया
घुटन की उस चार दीवारी से
वो खुद को ना बाहर निकाल पाई.

कि सब कुछ कह कर भी वह
किसी को कुछ ना समझा पाई
जो कुछ ज्यादा कह गई तो
डांट कर उसको ही,

चुप कराया गया
नासमझी की हद में रहो
कह, हर बार लताड़ा गया
मजबर असहाय हर बदतमीजी को
मजबूर, 

असहाय हर बदतमीजी को
उसने चुपचाप बर्दाश्त किया
अपनों को ही, ना समझा पाने की
नाकामयाबी पर उसने
रज कर खुद को कोसा
रिश्तों के इस धोखे में
किस्मत को भी

बहुत रोया.....

समझ गई थी कि रिश्ते ने
जितना इंसान को है मज़बूत किया
उतना ही अक्सर मजबूर भी किया
जो इनकी अच्छाई में
बुराई किसी को दिखती नहीं
मान के अंधेपन में

बेइमानी भी दिखती नहीं
जिसने उसके बचपन तक को
डर के अंधियारे में धकेला
बेखौफ नन्हें कदमों को
खौफ की आहट ने घेरा........

की अब उसे ना चॉकलेट भाती थी
ना खिलौनों में उसकी रुचि थी
गुम सी, खोई- खोई वो रहा करती थी
हर किसी को ये बदलाव उसमें दिखता था
पर समझने का इसे,

किसी का ना नजरिया था किसी को वो अल्हड लगी
किसी को जिद्दी और बदतमीज लगी
पर किसी ने ना जानी
बिन आँसू उसके रोने की वजह
किसी ने ना जानी, बचपने में ही
खामोश होने की वजह.....

फिर एक दिन वो सह ना सकी
बढ़ती उम्र के साथ, उसकी
जिंदगी से नाराज़गी भी बढ़ने लगी
कि आखिर कदम उसने वो उठाया
जिसकी किसी ने सोची भी ना थी

माँ को लिख वो पहला और आखिरी ख़त
उसने जीवन को कहा अलविदा
अपनी हर निराश आशा को

उसने शब्दों में किया बयां
कि शब्द बेज़ान थे
पर दर्द के उसको वो
करते कुछ इस तरह बयान थे
कि नफ़रत सी होने लगी सबको खुद से

उसकी बातों को ना समझ पाने की
बिलखती रही वो ममता,
बेटी को चीख तक को ना सुन पाने में....
बस अफ़सोस रह गया.
अब अपनों में मलाल रह गया रिश्तों में पर फिर भी,
नाम खानदान का उछलेगा

कह हर कोई चुप रह गया
पर वो माँ अब हर किसी से कहती है
बच्चों की बातों में हमेशा
बचपना या शैतानी नहीं होती
इसलिए उनकी बातों को

अनदेखा ना किया करो
वक़्त पर ना छोड़ा करो ।।
जो हो गया, अब वो ना बदलेगा
कह हर कोई मन को भुलाता रहा
उनमें आते बदलाव को .!