जिदंगी के भी बहुत नखरे है जालिम
कभी वो खुद से रुठता
तो कभी दुसरो से
कभी वो खुद से मानता
तो कभी दुसरो के मनाने से।
जिदंगी के भी बहुत नखरे है जालिम,
कभी वो खुद को समझाता
तो कभी दुसरो को सिखाता
कभी वो खुद गलती करता
तो कभी दुसरो को गलती दिखाता।
जिदंगी के भी बहुत नखरे है जालिम,
कभी ये दुसरो को सही दिशा दिखाता
तो कभी खुद ही गलत राह चुन लेता
पता नहीं यह क्या करता
इसे खुद को समझ नहीं आता।
जिदंगी के भी बहुत नखरे है जालिम।