समंदर ने सूरज पकड़ रखा है,
ढल कर रुकी शाम भी सुनहरी हुई |
शाखो के पत्ते शबनम न छोड़े,
फिजा भी पहाड़ों की ठहरी हुई।
ना बरसे, गरज कर बादल बुलाते,
आसमान की रंगत भी चितकबरी हुई।
घाटी में गुम वो चाय की टपरी,
मेरे नाम की प्याली और भी गहरी हुई।
सुबह से साहिल पर रूठी हैं लहरे,
चलो निकलो !!
अब तो जिंदगी की भी दुपहरी हुई ।
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